कहानी एक...         Download as PDF

22 Jan 2015

धूप-छाँव, आशा-निराशा, सुख-दुःख, जीवन-मरण का खेल ही इस उपन्यास का प्राणतत्व है जो हमें विभिन्न पहलुओं पर सोचने के लिए विवश करते हुए जिंदगी की चौखट पर इसलिए खड़ा करता है कि घटित हो रही घटनाओं को हम कैसे अनुभव करते हैं. हम कभी मूल पात्र होते हैं तो कभी अंश मात्र... हम वास्तव में जो होते हैं वही हमारा प्रतिबिम्ब होता है. कुछ ऐसा ही इसके नायक ‘सागर’ के साथ होता है. वह चिंकी, मैडम, तरन्नुम, उपमा और नेहा के साथ भावनात्मक रूप से रोमांचक रोमांस करते हुए स्वयं की विभिन्न तरीकों से गुजरते, टूटते-बिखरते, जीतते-हारते पाता है. एक तरह से वह अपनी जिन्दगी को संघर्षों की मैराथन रेस जैसा अनुभव करता है. उदासी, निराशा, चिंता, वेदना. क्रोध आदि ‘सागर’ की गहन समस्या है जो इनसे उन्मुक्ति हेतु तड़पता रहता है. जो कुछ भी हम सोचते अथवा चाहते हैं, अतृप्तावस्था में वही कामनाएं और दबी हुई इच्छाएं हमारे मानसपटल पर कल्पनाओं के रूप में स्वप्न बनकर उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं. यथार्थ का सामना करने के लिए अदम्य साहस चाहिए. ऐसा हरेक के जीवन में कभी न कभी अवश्य होता है किन्तु कभी-कभी ऐसे ही क्षण आते हैं जब वह पूरी तरह स्वयं को असहाय अनुभव करता है. प्रस्तुत उपन्यास व्यावहारिक जीवन के उथल-पुथल, उत्त्थान-पतन तथा संघर्षों पर आधारित नवीन आयामों का स्पर्श करते हुए सामाजिक, एैतिहासिक, राजनैतिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वरूपों का यथार्थ/नग्न चित्रण है. इसमें अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि पर विवादित ढाँचा ढहाने विषयक ‘कारसेवा’ की झाँकी का मार्मिक चित्रण तथा रक्त रंजित इतिहास भी प्रभावी रूप से वर्णित है. राजनैतिक पार्टियों द्वारा धार्मिक उन्माद भड़का कर धर्मानन्धता के तवे पर सियासत की रोटी सेंकने का रोचक स्वरुप इसी कथानक से....... मैं आह्वान करता हूँ, युवक युवतियों का----बनों... जितना बन सकते हो बनों--- ये रास्त्र तुम्हारा है... ये धरोहर तुम्हारी है. इसलिए लालू बनो...मुलायम बनो...मायावती या राबड़ी देवी बनो…नहीं बनोगे तो रास्त्र अपनी पहचान खो देगा क्योंकि इस रास्त्र को अब सम्राट अशोक की जरुरत नहीं रही...शिवा जी की आवश्यकता नगणय हो चली है...झाँषी की रानी किताबों में सिमट कर रह गई हैं और स्वतंत्रता सेनानी... इनकी हो रही घोर उपेचछा के प्रति तो मेरे पास शब्द ही नहीं हैं... आज बेचारे हो गई हैं ये विभूतियाँ..........