स्वप्न के गाँव में


जीवन के कोरे कागज पर कैसा गीत लिखूँ
बोलो तुमको गैर लिखूँ या मन का मीत लिखूँ

अभी तलक तेरी नज़रों का नाज़ वही अंदाज़ वही
कौन समझ पाया है तेरे ख्वाबों का परवाज़ वही
कितने भगत पुजारी छोड़े अपनी कंठी माला को
बहुत खोलना चाहा फिर भी ओठों पर है राज वही
दिल के टूटे हुए तार पर क्या संगीत लिखूँ
बोलो तुमको गैर लिखूँ या........

अश्कों से जो लिखी गई वह कितनी अजब कहानी है
पीड़ा जलन घुटन से लिपटी तूने दिया निशानी है
खुद को भुला चुका हूँ अब तक तेरी सुधियों के पीछे 
जितना तुझे जानना चाहा उतनी ही अनजानी है
होती हो अनरीत उसे मै कैसे रीत लिखूँ 
बोलो तुमको गैर लिखूँ या........

सूने आँगन को कैसे आबाद चमन बतलाएंगे
नश्वर है संसार उसे शाश्वत कैसे लिख पाएंगे 
जहाँ प्यार मनुहार नहीं है भावों की रसधार नहीं
सूखी हुई नदी में आखिर कैसे नाव चलाएंगे
भला दहकते अंगारों को कैसे शीत लिखूँ 
बोलो तुमको गैर लिखूँ या........

ज़हर भरे प्याले को कैसे आखिर मैं हाला लिख दूँ
जीवन में विष घोल रही जो कैसे मधुशाला लिख दूँ
सुंदर लेकिन गंध रहित है ये टेसू का फूल 
सूखे भावों के तड़ाग को कैसे रस प्याला लिख दूँ
हारा जो हर मोड़ पर उसे कैसे जीत लिखूँ 
बोलो तुमको गैर लिखूँ या........