स्वप्न के गाँव में


हाय क्या हो रहा स्वप्न के गाँव में 
हम सफ़र कर रहे कागजी नाव में
हाय क्या हो रहा.....

रात ढलने लगी, हर बशर सो गया
आँख जलने लगी शोर कम हो गया
धुंध की जद में परछाइयाँ खो गई 
सिसकियाँ पी के सरगोशियाँ सो गई
अब चले कैसे छाले पड़े पाँव में 
हाय क्या हो रहा.....

टूट लहरों की अँगड़ाइयाँ खो गई 
यू मधुर स्वर की शहनाइयाँ सो गई 
ओठ पर ओठ रखकर कहीं खो गए
ओढ़ सपनों की चादर को हम सो गए
दिल पराजित हुआ एक ही दाँव में
हाय क्या हो रहा.....

इश्क इजहार करने को जब जब गए
लफ्ज खुद अपनी आवाज में दब गए 
सिर्फ आँखों ने आँखों की भाषा पढ़ी 
दिल ने फिर खूबसूरत कहानी गढ़ी
प्यास अब तक न बुझी किसी ठाँव में 
हाय क्या हो रहा.....

आओ नीले गगन के तले हम चले 
छाँव में भी पले धूप में भी ढले
वो बिछड़ क्या गए स्वप्न ही मर गए
मन के उपवन में पतझड़ की ऋतु दे गए
कोकिला सुर दबा काग की काँव में
हाय क्या हो रहा.....