रूठ मत मेरी उमर


बुझते दिए के साथ पिघलने लगी है रात
जामो सुबू के बाद मचलने लगी है रात

ख्वाबों में उलझनों के दौर इस कदर चले
करवट बदल-बदल के अखरने लगी है रात

शर्मा गया है चाँद तेरा रूप देखकर
पहलु से धीरे धीरे फिसलने लगी है रात 

एतबार नहीं  हुस्न तेरी नज़रें करम  का 
पानी के बुलबुले सी उभरने लगी है रात 

आ जा कि तेरे हुस्न का सदका उतार लूँ
कितनी हसींन शोख सी लगने लगी है रात